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शब्दयोग सत्संग
१७ फ़रवरी, २०१७
अद्वैत बोधस्थल, नॉएडा
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः |लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि || २० ||
जानकादि भी कर्म (निष्काम कर्म) द्वारा ही सिद्धि को प्राप्त हुए थे। इसीलिए लोकसंग्रह के लिए भी तुझे कर्म करना चाहिए।
(अध्याय ३, श्लोक २०)
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः |स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते || २१ ||
श्रेष्ठ पुरुष जैसा-जैसा आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण प्रस्तुत कर देता है, समस्त मनुष्य उसी का अनुगमन करने लगते हैं।
(अध्याय ३, श्लोक २१)
प्रसंग:
क्या हमारे उच्चतम संभावना का नाम श्री कृष्ण है?
श्री कृष्ण "श्रेष्ठ पुरुष" किसे कहते है?
श्रेष्ठ पुरुष जैसा-जैसा आचरण कैसे बनाए?